मरा हूँ जब से मैं उस पर, नहीं डरता हूँ मरने से वो यूँ इठला के है चलती, गिरे ज्यूँ नीर झरने से…

मरा हूँ जब से मैं उस पर, नहीं डरता हूँ मरने से वो यूँ इठला के है चलती, गिरे ज्यूँ नीर झरने से, धड़कती हो मेरी सांसो में तुम ही रागनी बनकर उठूँगा अब तो मैं जानम, तुम्हें पाकर ही धरने से डॉ रसिक गुप्ता

जिसने गढ़ा वजूद तुम्हारा भाव उन्हीं के पढ़े नहीं मात-पिता भेजे वृद्धाश्रम किंतु शर्म से…

जिसने गढ़ा वजूद तुम्हारा भाव उन्हीं के पढ़े नहीं मात-पिता भेजे वृद्धाश्रम किंतु शर्म से गड़े नहीं ईश्वर में तो रखी आस्था लेकिन वो ये भूल गए सृष्टि के निर्माता भी तो मात-पिता से बड़े नहीं                                      –  […]