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शाम दाम औ दंड भेद    का केवल एक विधाता कान्हा से ,कब कौन बड़ा है कूटनीति का ज्ञाता ,
 
शत्रु तुम्हारे जितने ,भी थे सब को किया ठिकाने राजनीति की ,चाल तुम्हारी कौन भला पहचाने उंगली ,पर रखा गोवर्धन इंद्र अहम को तोड़ा,
जिसे बनाया आपने, अपना साथ में उसका छोड़ा,
 
 चीर बढ़ाई लाज बचाई धन्य द्रोपदी माता ,
 कान्हा से कब कौन, बड़ा है कूटनीति का ज्ञाता,
 
गीता का उपदेश न ,देते तो अर्जुन क्या लड़ता,
रण में भाई बंधु दिखे ,तो पांव नहीं था बढ़ता,
युद्ध भूमि में अर्जुन ,को जब रूप विराट दिखाया बड़ा नहीं, है धर्म से कोई तभी समझ में आया ,
 
वरना अपनों को अर्जुन, क्या मौत की नींद सुलाता,
कान्हा से कब कौन ,बड़ा है कूटनीति का ज्ञाता,
 
कंस असुर की सेना हो ,या हो शकुनि का पासा,
जो भी चाहा कर ,दिखलाया तुमने स्वयं तमाशा ,
गोप गोपियां राधा ,के संग तुमने रास रचाए ,
नाग नथैया बैठ फनों, पर कान्हा जी कहलाए,
सिवा आपके कौन ,भला जो धर्मयुद्ध जितवाता,
कान्हा से कब कौन ,बड़ा है कूटनीति का ज्ञाता,
 
रसिक गुप्ता